MPPSC 2022: मध्य प्रदेश की लोक शिल्पकला

लोकशिल्प, शिल्पकला का वह नमूना है, जो आदिवासी व लोक अंचल में परम्परागत रूप से प्रचलित होता है व जिसमें आम जनमानस द्वारा विभिन्‍न आकार-प्रकार की सुंदर आकृतियों का निर्माण हाथ से किया जाता है।

प्रदेश के विभिनन क्षेत्रों में लोक शिल्प के विविध रूप प्रचलित है –

गुड़िया शिल्प

म.प्र. के ग्वालियर अंचल में गुड़िया शिल्प प्रमुख रूप से प्रचलित है। यहाँ पर कपड़े, लकड़ी तथा कागज से विभिन्न प्रकार की गुड़ियाएँ बनाई जाती है।

गुड्डे-गुड़ियाँ का विवाह कराया जाता है और उनके नाम से व्रत पूजा की जाती है।

अपने आकार-प्रकार, साज-सज्जा व बनावट की दृष्टि से ग्वालियर अंचल की गुड़ियाएँ प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश में भी प्रसिद्ध है। प्रदेश का झाबुआ, भीली गुड़िया का केंद्र है। यहाँ पर यह शिल्प एक अनुष्ठान के रूप में प्रचलित है।

कलाकार भील जनजाति की शारीरिक बनावट, उनकी वेशभूषा आभूषण, अलंकरण, धनुष-बाण धारण करना आदि को देखकर विभिनन प्रकार की गुड़ियाएँ बनाते हैं। जिनमें कल्पनाशीलता स्पष्टतया दृष्टिगोचर होती है।

अपनी साज-सज्जा के कारण भीली गुड़ियाएँ प्रदेश व देश में प्रशंसा प्राप्त कर चुकी हैं।

ग्वालियर की परम्परागत गुड़िया शिल्प कला की श्रेष्ठ कलाकार श्रीमती बत्तो बाई है।

लाख शिल्प

वृक्ष में पाये जाने वाले जीव से लाख निकाली जाती है। लाख की गरम करके उसमें विभिन्‍न रंगों को मिलाकर अलग-अलग रंगों के चूड़े बनाये जाते हैं ।

लाख का काम करने वाली एक जाति का नाम ही लखार है। लखार जाति के स्त्री-पुरूष दोनों पारम्परिक रूप से लाख कर्म में दक्ष होते हैं। लाख के चूड़े, कलात्मक खिलौने, श्रृंगार पेटी, डिब्बियाँ, लाख के अलंकुत पशु-पक्षी आदि वस्तुएँ बनायी जाती हैं। म.प्र. में इन्दौर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर, महेश्वर लाख शिल्प के परम्परागत केन्द्रों में से हैं । लाख की कलात्मक चूड़ियाँ बनाने वाले प्रमुख कलाकार उज्जैन के श्री राजेन्द्र लखारा हैं।

काष्ठ शिल्प

काष्ठ शिल्प की परम्परा बहुत प्राचीन और समृद्ध है। लकड़ी के विभिन्‍न रूपाकारों को उतारने की कोशिश मनुष्य ने आदिम युग से शुरू कर दी थी। जब से मनुष्य ने मकान में रहना सीखा तब से काष्ठ कला की प्रतिष्ठा बढ़ी ।

इसलिए काष्ट से निर्मित मनुष्य के आस्था के केन्द्र मंदिर और उसके निवास स्थापत्य कला के चरण कहे जा सकते हैं। आदिम समूहों में काह में विभिन्‍न रूपाकार उकेरने की प्रवृत्ति सहज रूप से देखी जा सकती है। कोरकू के मृतक स्तम्भ ‘ मंदो ‘ भीलों के कलात्मक “दिवाण्या” काष्ट कला के श्रेष्ठ नमूने हैं। गाड़ी के पहियों, देवी-देवताओं की मूर्तियों, घर के दरवाजों आदि वस्तुओं में काष्ठ कला का उत्कृष्ट रूप प्राचीन समय से ही देखा जा सकता है।

कंघी शिल्प

सम्पूर्ण भारत के ग्रामीण समाज में आमतौर पर और आदिवासी समाज में खासतौर पर अनेक प्रकार की कंधियों का प्राचीनकाल से ही प्रचलन रहा है।

आदिवासियों में तो कंघीयों का इतना अधिक महत्व है कि कंधिया अलंकरण, गोदना एवं भित्ति चित्रों में एक मोटिव के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके है

इन कंधियाँ में कढ़ाई के सुन्दर काम के साथ ही रत्नों की जड़ाई, मीनाकारी आदि द्वारा उनका अलंकरण किया जाता है।

कंघी बनाने का श्रेय बंजारा जनजाति को हैं।

मालवा में कंघी बनाने का कार्य उज्जैन रतलाम, नीमच में होता है।

कठपुतली शिल्प

मध्य प्रदेश में कठपुतली कला राजस्थान तथा उत्तरप्रदेश से आई है।

कथाओं तथा ऐतिहासिक घटनाओं को नाटकीय अंदाज में व्यक्त करने की मनोरंजक विधा कठपुतली है। जिसमें मानवीय विचारों और भावों को अभिव्यक्त करने की गुंजाइश निहित है।

कठपुतली के प्रसिद्ध पात्र अनारकली, अकबर, बीरबल, घुड़सवार, साँप और जोगी होते हैं।

यह लकड़ी और कपड़े से निर्मित की जाती है। उसमें चमकीली गोटे लगाकर उसे सजाया जाता है। इसे नचाने का काम मुख्यत: नट जाति केलोगकरते हैं।

कठपुतलियाँ कठिन से कठिन मानवीय स्थितियों को प्रस्तुत करने में समर्थ होती है।

मिट्टी शिल्प

मिट्टी शिल्प आदि शिल्प है, मनुष्य ने सबसे पहले मिट्टी के बर्तन बनाये।

मिट्टी के खिलौने और मूर्तियाँ बनाने की प्राचीन परम्परा है। मिट्टी का कार्य करने वाले कुम्हार होते हैं।

लोक और आदिवासी जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुओं के साथ कुम्हार कलात्मक रूपाकारों का भी निर्माण करते हैं।

म.प्र. के विभिन्‍न अंचलों की मिट॒टी शिल्पकला की ख्याति सिर्फ प्रदेश नहीं देश व विदेशों में भी है।

प्रदेश के झाबुआ, मण्डला, बैतूल आदि के मिट्टी शिल्प अपनीअपनी निजी विशेषताओं के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

विभिन्न लोकांचलों की पारम्परिक मिट॒टी शिल्प कला का वैभव पर्व त्यौहारों पर देखा जा सकता है।

धातु शिल्प

. मध्यप्रदेश में धातु शिल्प की परम्परा अति प्राचीन रही है। प्रदेश के लगभग सभी आदिवासी और लोकांचलों के कलाकार पारम्परिक रूप से धातु की ढलाई का कार्य करते है। के

अगरिया जनजाति का सम्बन्ध धातु के साथ प्रारंभ से रहा है तो कसेरा, ठठेण और सुनार धातु के सिद्धहस्त शिल्पी है।

ये सदियों से सौन्दर्यपरक, आनुष्ठानिक और उपयोगी कलाकृतियौं आंचलिक आवश्यकता और सौन्दर्य चेतना के अनुसार सहज रूप से बनाते है।

प्रदेश के टीकमगढ़, मण्डला, चीचली (गाडणवाड़ा) का धातु शिल्प आज भी लोगों को आकर्षित करता है।

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